क्या पुलिस अधिकारियों को कार्यकारी मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ देना उचित है?

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा द्वारा पुलिस के शांति बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने से इंकार करने और उच्च न्यायालय से भी उन्हें कोई विशेष राहत नहीं मिलने से उनके ऊपर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। यदि ऐसा होता है तो क्या ऐसे में यह एक तरह से नागरिकों के अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार के विरुद्ध नहीं होगा? सत्ता की नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों से असहमति के विरुद्ध शांतिपूर्ण और गांधीवादी तरीके से आवाज़ उठाना कोई अपराध नहीं है।

यदि सरकार के विरोध में धरना-प्रदर्शन करने पर शांति भंग होने की आशंका बताकर पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति से शांति-मुचलका भरने को कहा जाए, तो क्या यह प्रक्रिया असहमति के अधिकार को सीमित करना नहीं है? अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कानून से परे पुलिस-प्रशासन का इस्तेमाल करने वाले सत्ताधारी तो कहीं भी धरना-प्रदर्शन को ठीक नहीं कहेंगे। इसलिए इस विषय को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार प्राप्त है।

सर्वोच्च न्यायालय ने रामलीला मैदान बनाम गृह सचिव, भारत सरकार (2012/5 SCC 1) सहित विभिन्न मामलों में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता दी है। न्यायालय ने 4–5 जून, 2011 की आधी रात रामलीला मैदान से नींद में सोए प्रदर्शनकारियों को जबरन निकालने और बिना पर्याप्त आधार के धारा 144 CrPC लगाने को अनुचित, मनमाना तथा असंगत पाया। इसे अनुच्छेद 19 और 21 के अधिकारों का अतिक्रमण माना गया।

हालाँकि यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है; सार्वजनिक व्यवस्था सहित संविधान में निर्दिष्ट आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं लेकिन केवल सरकार की आलोचना करना या किसी सरकारी अधिकारी के इस्तीफे की माँग करना अपने-आप में शांति भंग करना नहीं है।

इसलिए पुलिस यह नहीं मान सकती कि सरकार के विरुद्ध प्रदर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति संभावित उपद्रवी है। प्रतिबंधों का औचित्य वास्तविक परिस्थितियों और कानून के अनुरूप होना चाहिए।

इस कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाने के लिए हो सकता है। मान लीजिए कि कोई संगठन सरकार, चुनाव आयोग, बेरोजगारी, चुनाव आयोग या सरकार की किसी नीति के विरुद्ध शांतिपूर्ण धरना देना चाहता है। पुलिस पहले से यह आशंका व्यक्त करके उसके नेताओं से मुचलका भरवाने लगे कि वे भविष्य में शांति भंग कर सकते हैं। मुचलका न भरने पर हिरासत का खतरा हो, तो लोग गिरफ्तारी के भय से प्रदर्शन करना ही छोड़ सकते हैं।
इस स्थिति में कानून का निवारक उद्देश्य व्यवहार में असहमति को दबाने का साधन बन सकता है। लेकिन यह निष्कर्ष निकालने के लिए कि किसी विशेष मामले में ऐसा ही हुआ है, सम्बंधित आदेश, पुलिस की सामग्री और वास्तविक परिस्थितियों की जाँच आवश्यक है।

प्रदर्शन की अनुमति देने या रोकने की शक्ति यदि पुलिस के विवेक पर अत्यधिक निर्भर हो जाए, तो नागरिकों का मौलिक अधिकार प्रशासन की इच्छा पर निर्भर होने लगता है।

आलोच्य प्रक्रिया में पुलिस को दी गई मजिस्ट्रेटी शक्ति विचारणीय है जिसमें पुलिस ही किसी व्यक्ति के विरुद्ध शांति भंग करने की आशंका का आरोप प्रस्तुत करती है और फिर पुलिस विभाग का ही एक अधिकारी मजिस्ट्रेट बनकर उस आरोप पर सुनवाई भी करता, तो निष्पक्षता और शक्तियों के पृथक्करण पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

दिल्ली में दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 70 के अंतर्गत कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, जिनमें सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) स्तर के अधिकारी भी शामिल हैं, को सीमित कार्यकारी मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ दी गई हैं। ये शक्तियाँ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के सम्बंधित प्रावधानों के अंतर्गत प्रयोग की जाती हैं। अर्थात, कानूनी व्यवस्था में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) को न्यायिक मजिस्ट्रेट के बराबर नहीं माना गया है लेकिन इससे इस बात का समाधान नहीं हो जाता, क्योंकि विवाद एक ही पुलिस तंत्र के भीतर आरोप लगाने और उस पर निर्णय करने की भूमिका के टकराव का है।

ऐसे ही एक मामले में मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने पी. सतीश कुमार बनाम राज्य मामले में 13 मार्च, 2023 को पुलिस अधिकारियों को कुछ कार्यकारी मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ देने वाले सरकारी आदेशों को असंवैधानिक ठहराया। न्यायालय ने जाँच, अभियोजन और निर्णय की भूमिकाएँ पुलिस के भीतर केंद्रित होने से निष्पक्षता पर पड़ने वाले खतरे को रेखांकित किया। उसके बाद 1 अप्रैल, 2026 को मद्रास उच्च न्यायालय ने पुलिस अधिकारियों को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट नियुक्त करने सम्बंधी तमिलनाडु सरकार के एक नए आदेश के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाई। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत से सम्बंधित प्रश्न उठाए। यह उस आदेश पर अंतरिम रोक थी, पूरे भारत में लागू कोई अंतिम निर्णय नहीं।

यहाँ एक सावधानी आवश्यक है कि तमिलनाडु में लागू स्थानीय कानून और दिल्ली में लागू दिल्ली पुलिस अधिनियम अलग हैं। इसलिए तमिलनाडु के निर्णय को दिल्ली पर स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।

फिर भी, वह यहाँ उठाए गए प्रश्न की संवैधानिक गंभीरता को स्पष्ट करता है। मुद्दा केवल यह नहीं है कि पुलिस अधिकारी द्वारा आरोप प्रस्तुत करने और उसी पुलिस तंत्र के अधिकारी द्वारा उस पर निर्णय देने में हितों का टकराव है, बल्कि यह है कि नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली न्यायिक शक्ति को ऐसे तंत्र के हाथों में ही नहीं सौंपना चाहिए, जिसका प्रशासनिक नियंत्रण राजनीतिक सत्ता के अधीन होता है। इस अंतर को समझना आवश्यक है।

पुलिस का दायित्व कानून लागू करना, अपराध रोकना और सार्वजनिक शांति बनाए रखना है। दूसरी ओर, लोकतंत्र में नागरिकों को सरकार की नीतियों, योजनाओं और निर्णयों से असहमत होने, उनकी आलोचना करने और शांतिपूर्ण विरोध करने का अधिकार है। यह असहमति शासन व्यवस्था का स्वाभाविक अंग है, न कि अपने-आप में कानून-व्यवस्था की समस्या।

फिर समाधान क्या होना चाहिए? तार्किक रूप से तीन सुधारों पर विचार किया जा सकता है—

1. पुलिस और निर्णयकर्ता का संस्थागत पृथक्करण—पुलिस तथ्य और सामग्री प्रस्तुत करे, लेकिन शांति-मुचलके जैसी कार्रवाई की आवश्यकता का स्वतंत्र परीक्षण पुलिस से बाहर का सक्षम मजिस्ट्रेट करे।
2. राजनीतिक असहमति के लिए स्पष्ट सुरक्षा—सरकार की आलोचना, शांतिपूर्ण धरने का आह्वान या नीतिगत विरोध अपने-आप में शांति भंग होने का पर्याप्त आधार न माना जाए।
3. स्वतंत्र न्यायिक समीक्षा—यदि निवारक कार्रवाई से स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, तो व्यक्ति को शीघ्र और प्रभावी न्यायिक चुनौती का अवसर मिले।

इन सुधारों से सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा—दोनों के बीच अधिक विश्वसनीय संतुलन स्थापित किया जा सकता है।

निष्कर्षत: इस मूल दलील का सार यह है कि नागरिक को राजनीतिक सत्ता की नीतियों का विरोध करने के लिए उसी सत्ता के प्रशासनिक तंत्र की सद्भावना पर निर्भर नहीं होना चाहिए; उसकी स्वतंत्रता की रक्षा स्वतंत्र और निष्पक्ष कानूनी व्यवस्था से होनी चाहिए।

यह लोकतांत्रिक शासन के एक महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने रखता है। पुलिस को कानून लागू करने और शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक अधिकार मिलना एक बात है; उन्हीं अधिकारों के माध्यम से असहमति व्यक्त करने वाले नागरिक की स्वतंत्रता पर निर्णय करने की शक्ति मिलना दूसरी बात है।
इसलिए पुलिस अधिकारियों को कार्यकारी मजिस्ट्रेटी शक्तियाँ देने की व्यवस्था पर पुनर्विचार करना एक गंभीर संवैधानिक सुधार-प्रस्ताव है। उसके औचित्य का परीक्षण केवल प्रशासनिक सुविधा से नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, निष्पक्षता और सत्ता के दुरुपयोग से सुरक्षा के आधार पर भी होना चाहिए।

(श्याम सिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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